रिश्तों का आईना - शादी के बाद
शादी के बाद आदमी के जीवन में दो घर हो जाते हैं। एक जहाँ उसने जन्म लिया, और दूसरा जहाँ से उसकी जन्म-जन्म की साथी आई।
और यहीं से एक अनकहा बंटवारा शुरू हो जाता है।
पहला पड़ाव - दिखावे का दौर
शादी के बाद हर आदमी चाहता है कि दुनिया कहे - "देखो कितना अच्छा दामाद मिला है।"
इसलिए हर खुशी के मौके पर पहली कुर्सी ससुराल की हो जाती है।
दीवाली की मिठाई पहले सास के घर जाएगी, होली के रंग पहले साली के साथ खेला जाएगा, कोई बड़ा फंक्शन है तो दामाद जी को सबसे आगे बिठाया जाएगा, फेसबुक-इंस्टाग्राम की फोटो में भी वही चेहरे सबसे करीब होंगे।
क्यों? क्योंकि ये रिश्ता नया है, इसे बनाना पड़ता है, सजाना पड़ता है, दिखाना पड़ता है।
और इसी बनाने-सजाने-दिखाने में, वो रिश्ते जो बिना बनाए ही बने थे, वो धुंधले पड़ने लगते हैं।
माँ का फोन - "बेटा दो मिनट बात कर ले"
जवाब - "माँ अभी थोड़ा busy हूँ, ससुराल में सब बैठे हैं, बाद में करता हूँ।"
वो "बाद में" कभी-कभी महीनों बाद आता है।
भाई कहता है - "भैया घर आ जाओ"
जवाब - "इस बार साली का बर्थडे है, अगली बार पक्का।"
बहन राखी पर इंतजार करती रह जाती है, क्योंकि भाई को ससुराल में त्योहार मनाना है।
हम भूल जाते हैं कि माँ-बाप ने हमें पालने में कोई "बाद में" नहीं किया था।
दूसरा पड़ाव - सच का दौर
फिर जिंदगी अपने असली रंग में आती है।
एक दिन अचानक बुखार तेज हो जाता है, एक्सीडेंट हो जाता है, या डॉक्टर कह देता है - "एडमिट करना पड़ेगा।"
आप अस्पताल के बिस्तर पर होते हैं। सफेद चादर, हाथ में सुई, और सामने एक अनिश्चितता।
आप फोन उठाते हैं, हिम्मत करके...
उधर से आवाज आती है - "अरे दामाद जी, बहुत अफसोस हुआ, अपना ध्यान रखिएगा। हम मंदिर में प्रार्थना करेंगे। जीजा जी को तो ऑफिस जाना है, सासू माँ की तबीयत भी ठीक नहीं है।"
बात खत्म।
और तभी अस्पताल के दरवाजे पर शोर सा होता है।
वही माँ जिसे आपने कहा था "बाद में बात करता हूँ", वो बिना चप्पल के भागी चली आ रही है, आँचल से आंसू पोंछते हुए।
वही बाप जो कभी आपके सामने रोया नहीं, वो डॉक्टर के पैर पकड़ने को तैयार है - "साहब, कितना भी पैसा लग जाए, बस मेरे बेटे को बचा लो।"
वही भाई जो आपको रोज़ तंग करता था, वो खून देने के लिए लाइन में सबसे आगे खड़ा है।
और वही बहन, जिसे आपने पिछले त्योहार पर भुला दिया था, वो कोने में बैठी भगवान से आपकी उम्र मांग रही है।
उस दिन कोई हिसाब नहीं मांगता। कोई शिकायत नहीं करता कि तुमने हमें कब याद किया था।
आखिरी बात
ससुराल के रिश्ते दिल से निभाओ, उनका सम्मान करो, क्योंकि उन्होंने तुम्हें अपनी सबसे कीमती अमानत दी है। सास को माँ जैसा सम्मान दो, साली को बहन जैसा प्यार दो। ये तुम्हारा धर्म है।
लेकिन ये धर्म, अपने पहले धर्म को मार कर मत निभाओ।
याद रखो -
सास-साली सजावट के फूल हैं, सुंदर लगते हैं, घर की शोभा बढ़ाते हैं।
पर माँ-बाप, भाई-बहन जड़ हैं। फूल मुरझा भी जाएं तो जड़ फिर से फूल उगा देती है, पर जड़ सूख गई तो पूरा पेड़ ही गिर जाता है।
खुशी में तालियां बजाने वाले पराए भी हो सकते हैं,
पर दुख में कंधा देने वाले सिर्फ अपने ही होते हैं।
इसलिए खुशी में सबको याद रखो,
पर दुख में कौन याद रहेगा, उसे कभी मत भूलो।
