इस तस्वीर में जो आँख है, वो सिर्फ एक आँख नहीं है...
ये वो आँख है जो सब देखती है। तुम्हारे आँसू भी, तुम्हारी मुस्कान के पीछे छुपा दर्द भी, और तुम्हारी वो दुआ भी जो तुमने कभी जुबान पर नहीं लाई।
भगवान की इच्छा से बड़ा कुछ भी नहीं।
इस एक लाइन में पूरी जिंदगी का सार है।
हम पूरी जिंदगी प्लान बनाते हैं। यहाँ जाना है, ये बनना है, इसे पाना है। और जब प्लान के हिसाब से नहीं होता, तो टूट जाते हैं। शिकायत करने लगते हैं - मेरे साथ ही ऐसा क्यों?
पर सच तो ये है, हमारा प्लान बहुत छोटा है और उनकी योजना बहुत बड़ी।
हम सिर्फ आज देखते हैं, वो हमारा पूरा कल देखते हैं। हम सिर्फ एक रास्ता देखते हैं, वो सारे रास्तों का अंत देखते हैं।
जैसे एक बच्चा रोता है जब माँ उसके हाथ से गंदा खिलौना छीन लेती है, उसे क्या पता माँ ने उसके लिए उससे बेहतर कुछ रखा है। ठीक वैसे ही हम भी रोते हैं जब भगवान हमसे कुछ छीनते हैं। हमें लगता है छीन लिया, पर वो तो हमें किसी बड़ी चीज़ के लिए तैयार कर रहे होते हैं।
"वो जहाँ ले जा रहे हैं, जैसे रख रहे हैं उसे स्वीकार करके चलते रहो"
स्वीकार का मतलब हार मानना नहीं है।
स्वीकार का मतलब है - भरोसा।
कि अगर आज अँधेरा है, तो इसी अँधेरे में वो मुझे रोशनी देखना सिखा रहे हैं।
अगर आज अकेला हूँ, तो वो मुझे खुद से मिलवा रहे हैं।
अगर आज कुछ खो गया है, तो वो मुझे बता रहे हैं कि मेरा असली सहारा सिर्फ वही हैं।
जगन्नाथ जी की ये बड़ी-बड़ी आँखें हमें यही तो सिखाती हैं। वो पलक नहीं झपकते। मतलब - वो तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ते। तुम सो जाते हो, पर वो जागते रहते हैं तुम्हारे लिए।
इसलिए लड़ना बंद करो। बहस करना बंद करो किस्मत से।
बस चलते रहो। अपना कर्म पूरी ईमानदारी से करो और परिणाम उन पर छोड़ दो।
क्योंकि आखिरी लाइन ही सबसे खूबसूरत है -
"उनसे बेहतर तुम्हारे लिए कोई नहीं सोच सकता"
माँ-बाप भी एक हद तक सोचते हैं, दोस्त-यार भी एक हद तक। पर वो... वो तुम्हारे लिए वो भी सोचते हैं जो तुम खुद के लिए भी नहीं सोच पाते।
तो आज से एक काम करो, जब भी मन घबराए, बस आँखें बंद करके कह दो -
"जैसी तेरी इच्छा, प्रभु।"
और देखना, दिल कैसे हल्का हो जाएगा।

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