*#हिन्दुओं याद रखना #मोदी,#योगी,और #शाह,इनकी #ईमानदारी पे कभी शक मत करना,,क्योंकि ये कोई नेता नही

Saturday, 25 July 2026

जब शादी हो जाती हैं तब भाइ बहन मा बाप से ज्यादा साली सास खास हो जाते हैं खास मौको पर पहले उन्हें ही याद किया जाता हैं। आगे रखा जाता है मगर

 रिश्तों का आईना - शादी के बाद


शादी के बाद आदमी के जीवन में दो घर हो जाते हैं। एक जहाँ उसने जन्म लिया, और दूसरा जहाँ से उसकी जन्म-जन्म की साथी आई।


और यहीं से एक अनकहा बंटवारा शुरू हो जाता है।


पहला पड़ाव - दिखावे का दौर


शादी के बाद हर आदमी चाहता है कि दुनिया कहे - "देखो कितना अच्छा दामाद मिला है।"


इसलिए हर खुशी के मौके पर पहली कुर्सी ससुराल की हो जाती है।


दीवाली की मिठाई पहले सास के घर जाएगी, होली के रंग पहले साली के साथ खेला जाएगा, कोई बड़ा फंक्शन है तो दामाद जी को सबसे आगे बिठाया जाएगा, फेसबुक-इंस्टाग्राम की फोटो में भी वही चेहरे सबसे करीब होंगे।


क्यों? क्योंकि ये रिश्ता नया है, इसे बनाना पड़ता है, सजाना पड़ता है, दिखाना पड़ता है।


और इसी बनाने-सजाने-दिखाने में, वो रिश्ते जो बिना बनाए ही बने थे, वो धुंधले पड़ने लगते हैं।


माँ का फोन - "बेटा दो मिनट बात कर ले"

जवाब - "माँ अभी थोड़ा busy हूँ, ससुराल में सब बैठे हैं, बाद में करता हूँ।"


वो "बाद में" कभी-कभी महीनों बाद आता है।


भाई कहता है - "भैया घर आ जाओ"

जवाब - "इस बार साली का बर्थडे है, अगली बार पक्का।"


बहन राखी पर इंतजार करती रह जाती है, क्योंकि भाई को ससुराल में त्योहार मनाना है।


हम भूल जाते हैं कि माँ-बाप ने हमें पालने में कोई "बाद में" नहीं किया था।


दूसरा पड़ाव - सच का दौर


फिर जिंदगी अपने असली रंग में आती है।


एक दिन अचानक बुखार तेज हो जाता है, एक्सीडेंट हो जाता है, या डॉक्टर कह देता है - "एडमिट करना पड़ेगा।"


आप अस्पताल के बिस्तर पर होते हैं। सफेद चादर, हाथ में सुई, और सामने एक अनिश्चितता।


आप फोन उठाते हैं, हिम्मत करके...


उधर से आवाज आती है - "अरे दामाद जी, बहुत अफसोस हुआ, अपना ध्यान रखिएगा। हम मंदिर में प्रार्थना करेंगे। जीजा जी को तो ऑफिस जाना है, सासू माँ की तबीयत भी ठीक नहीं है।"


बात खत्म।


और तभी अस्पताल के दरवाजे पर शोर सा होता है।


वही माँ जिसे आपने कहा था "बाद में बात करता हूँ", वो बिना चप्पल के भागी चली आ रही है, आँचल से आंसू पोंछते हुए।


वही बाप जो कभी आपके सामने रोया नहीं, वो डॉक्टर के पैर पकड़ने को तैयार है - "साहब, कितना भी पैसा लग जाए, बस मेरे बेटे को बचा लो।"


वही भाई जो आपको रोज़ तंग करता था, वो खून देने के लिए लाइन में सबसे आगे खड़ा है।


और वही बहन, जिसे आपने पिछले त्योहार पर भुला दिया था, वो कोने में बैठी भगवान से आपकी उम्र मांग रही है।


उस दिन कोई हिसाब नहीं मांगता। कोई शिकायत नहीं करता कि तुमने हमें कब याद किया था।


आखिरी बात


ससुराल के रिश्ते दिल से निभाओ, उनका सम्मान करो, क्योंकि उन्होंने तुम्हें अपनी सबसे कीमती अमानत दी है। सास को माँ जैसा सम्मान दो, साली को बहन जैसा प्यार दो। ये तुम्हारा धर्म है।


लेकिन ये धर्म, अपने पहले धर्म को मार कर मत निभाओ।


याद रखो -


सास-साली सजावट के फूल हैं, सुंदर लगते हैं, घर की शोभा बढ़ाते हैं।

पर माँ-बाप, भाई-बहन जड़ हैं। फूल मुरझा भी जाएं तो जड़ फिर से फूल उगा देती है, पर जड़ सूख गई तो पूरा पेड़ ही गिर जाता है।


खुशी में तालियां बजाने वाले पराए भी हो सकते हैं,

पर दुख में कंधा देने वाले सिर्फ अपने ही होते हैं।


इसलिए खुशी में सबको याद रखो,

पर दुख में कौन याद रहेगा, उसे कभी मत भूलो।




Friday, 24 July 2026

भगवान की इच्छा से बड़ा कुछ भी नहीं







इस तस्वीर में जो आँख है, वो सिर्फ एक आँख नहीं है...


ये वो आँख है जो सब देखती है। तुम्हारे आँसू भी, तुम्हारी मुस्कान के पीछे छुपा दर्द भी, और तुम्हारी वो दुआ भी जो तुमने कभी जुबान पर नहीं लाई।


भगवान की इच्छा से बड़ा कुछ भी नहीं।


इस एक लाइन में पूरी जिंदगी का सार है।


हम पूरी जिंदगी प्लान बनाते हैं। यहाँ जाना है, ये बनना है, इसे पाना है। और जब प्लान के हिसाब से नहीं होता, तो टूट जाते हैं। शिकायत करने लगते हैं - मेरे साथ ही ऐसा क्यों?


पर सच तो ये है, हमारा प्लान बहुत छोटा है और उनकी योजना बहुत बड़ी।


हम सिर्फ आज देखते हैं, वो हमारा पूरा कल देखते हैं। हम सिर्फ एक रास्ता देखते हैं, वो सारे रास्तों का अंत देखते हैं।


जैसे एक बच्चा रोता है जब माँ उसके हाथ से गंदा खिलौना छीन लेती है, उसे क्या पता माँ ने उसके लिए उससे बेहतर कुछ रखा है। ठीक वैसे ही हम भी रोते हैं जब भगवान हमसे कुछ छीनते हैं। हमें लगता है छीन लिया, पर वो तो हमें किसी बड़ी चीज़ के लिए तैयार कर रहे होते हैं।


"वो जहाँ ले जा रहे हैं, जैसे रख रहे हैं उसे स्वीकार करके चलते रहो"


स्वीकार का मतलब हार मानना नहीं है। 

स्वीकार का मतलब है - भरोसा।


कि अगर आज अँधेरा है, तो इसी अँधेरे में वो मुझे रोशनी देखना सिखा रहे हैं।

अगर आज अकेला हूँ, तो वो मुझे खुद से मिलवा रहे हैं।

अगर आज कुछ खो गया है, तो वो मुझे बता रहे हैं कि मेरा असली सहारा सिर्फ वही हैं।


जगन्नाथ जी की ये बड़ी-बड़ी आँखें हमें यही तो सिखाती हैं। वो पलक नहीं झपकते। मतलब - वो तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ते। तुम सो जाते हो, पर वो जागते रहते हैं तुम्हारे लिए।


इसलिए लड़ना बंद करो। बहस करना बंद करो किस्मत से।


बस चलते रहो। अपना कर्म पूरी ईमानदारी से करो और परिणाम उन पर छोड़ दो।


क्योंकि आखिरी लाइन ही सबसे खूबसूरत है -


"उनसे बेहतर तुम्हारे लिए कोई नहीं सोच सकता"


माँ-बाप भी एक हद तक सोचते हैं, दोस्त-यार भी एक हद तक। पर वो... वो तुम्हारे लिए वो भी सोचते हैं जो तुम खुद के लिए भी नहीं सोच पाते।


तो आज से एक काम करो, जब भी मन घबराए, बस आँखें बंद करके कह दो -


"जैसी तेरी इच्छा, प्रभु।"


और देखना, दिल कैसे हल्का हो जाएगा।